सहपुरवा
‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’
‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’
फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी...
‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा.
‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’
फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ...
‘हां रे बिफना परउ साल तऽ कवि सम्मेलनवा भयल रहऽल. जोखुआ कहत रहऽल के बड़ा मजा आयल रहऽल, हं रे चलऽल जाई, काहे न चलऽल जाई’
तीन चार बार सुर्ती ठोंक ठाक कर बिफना ने सुर्ती वाली हाथ की गदोरी फेकुआ की तरफ बढ़ा दिया. फेकुआ बिफना की गदोरी में से सुर्ती निकाल ही रहा था कि गांव के माने जाने मुखिया रामभरोस आ गये. रामभरोस खेतों की निगरानी के लिए निकले थे. सुर्ती मुंह में डाल कर फेकुआ ने रामभरोस से पूछा.. वह उन्हें चिढ़ाना चाहता था. अब पहिले वाला जमाना नाहीं है कि मजूरों को हंका दिया और काम शुरू, चाहे जोतनी हो, लवनी या कुछ भी.
‘सरकार! आप कऽ जोतनी आजु नहिंनी होत का?’
‘नाहीं रे! आज एकउ सारे काम पर अइबय नहीं कइनऽ, कुल मजूरवय बउराय गयल हवं. असउं सारेन के पट्टा का मिलि गयल, सभन कऽ दिमाग सिकहरे चढ़ि गयल बा, जब देख तब कामय बन्द कइ देनऽ सऽ, कातिक कऽ महीना बा अउर जोतनी बन्द, खेतवा उखड़ जाई तऽ का होई?’
रामभरोस ने बिफना व फेकुआ को ही नहीं पूरी हरिजन बिरादरी को उलाहा. सोनभद्र में बहुत पहले से ही हल जोतने का काम हरिजन ही किया करते हैं, एक तरह से हल जोतने में वंशवाद, बाप, फिर बेटा और बेटे के बाद बेटा.
फेकुआ को अपनी बिरादरी के बारे में रामभरोस की बातें सुन कर बुरा लगा. उसने भी रामभरोस की बात में बात जोड़ा...
‘हं सरकार! ई हरिजन हरिजनै रहि जइहंय, ई बिरादरियय अइसन हवय, अपनै हथवैं हरवा काहे नाही जोत लेहीत आप लोगन, लतियाईं हरिजनेन के, बनी मजूरी भी बचि जाई, कुलि घरे में रहि जाई. फिर आपन काम अपने हाथे
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करहीं के चाही.’
रामभरोस काहे के लिए फेकुआ की बातें सह पाते? उन्हें बहुत बुरा लगा..... हालांकि फेकुआ की बात कोई ऐसी नहीं थी जिससे कोई नाराज हो पर रामभरोस तो रामभरोस थे....
‘ई सारे कऽ मन बढ़ गयल बा, अइसन बतियावऽता, हमैं जबाब देता’
कोई दूसरी जगह होती तो रामभरोस फेकुआ को लतियाना शुरू कर देते पर जगह सिवान की थी, जहां रामभरोस अकेले थे, सिवान में फेकुआ को मारते तो जाने का होता. अगर फेकुआ भी लपट जाता तो...
वे अप्रत्याशित डर के कारण चुप थे.
रामभरोस ने देखा कि फेकुआ शरीर से गठा हुआ है, उन्हें मालूम था कि फेकुआ रियाज मारता है. वैसे भी फेकुआ एक दो आदमी को निपटा सकता है, रामभरोस ने मुड़ कर उसका शरीर देखा और सहम गये. उन्हें निराशा हुई, फेकुआ की तरह गठे हुए शरीर का अपनी बिरादरी में एक भी लड़का नहीं,
‘साला जाने का खाता है, अरे! का खाता होगा, भात और सिलहट की तरकारी, बहुत हुआ तो नून रोटी.’
जाने का बोल गया साला! अब यही रह गया कि रामभरोस हल चलांए, उनके लड़के हल जोतें, ये साले राड़, रहकार फिर का करेंगे, गद्दी पर बैठेंगे. ठीक है, जमाना बदल रहा है पर एकर का मतलब? कउआ हंस हो जाएगा, बाघ घांस खाएगा.’
रामभरोस काहे हल जोतेंगे? उनके घर में काहे की कमी है, पूरा गांव उनका है, ठीक है जमीनदारी टूट गई पर उन्होंने आज भी तीन चार सौ बीघे जमीन कुŸो, बिल्लियों के नाम से करके बचा ही ली है. आलीशान बखरी है, जवान बेटा है जो बाहर के अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है, गांव के परधान हैं, कांग्रेसी हैं, बी.डी.ओ. से लेकर दारोगा तक जान पहचान है, जिले का कोई भी आला हाकिम जब भी इस तरफ आता है, उनकी बखरी की ओर आए बिना वापस नहीं लौटता. कौन नहीं जानता कि कलक्टर साहब भूमि आवंटन के सिलसिले में पिछले साल पूरे लहसन के साथ रामभरोस की बखरी पर आये थे. जोरदार दावत हुई थी. अधिकारी भी दावत का इन्तजाम देख कर दंग रह गये थे.
और यह फेकुआ!.....
रामभरोस से हल जोतने के लिए बोल रहा है. उसे नहीं पता कि रामभरोस ही ऐसे किसान हैं जिन पर सीलिंग का मुकदमा चल रहा है, उन्हीं की पुश्तैनी जमीन पर सहपुरवा ही नहीं कई गांव आबाद हैं. जमीनदारी न टूटी होती तो किसी को एक धूर भी जमीन नहीं मिली होती. वैसे भी कई तरह की बातें हैं जो रामभरोस को सरकार कहलवाती हैं, ऐसा कुछ केवल परंपराओं के कारण ही नहीं तमाम अन्य कारणों से भी है, जैसे इलाके में सबसे अधिक धनी मानी होना, सबसे अधिक जमीन और जोत वाला होना, अधिकारियों का उनकी बखरी पर रोज रोज की दावतें लेना, दबंग होना और हमेशा लठैतों से घिरे
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रहना, बात बात पर किसी को लतिया देना आदि आदि. यही सारी बातें रामभरोस को लोगों से सरकार कहलवाती हैं. रामभरोस उस समय कुछ बोलना नहीं चाहते थे पर भीतरी ऐंठन बिना खुले रह जाए, ऐसा नहीं होता, वे खुले...
‘का रे फेकुआ! आज कल रियाज मारत हए का? देखत हई कि तोरे देंही पर मांस ढेर चढ़ि गयल बा, दिमग तऽ नहिंनी खराब होत नऽ’
रामभरोस की अधपकी मूंछें और सुर्ख ऑखों ने मिल जुल कर उनकी ऐसी आकृति बनाई कि फेकुआ फक्क रह गया. उसके देह की ऐंठन एक ही घुड़की में खुल गई. फेकुआ को अपने कहे पर अफसोस होने लगा.
फेकुआ को मालूम था कि रामभरोस ने रामगढ़ अस्पताल के सामने रमदिनवा को बुरी तरह पीटा था, जो तीन चार दिन बाद बिना दवा दारू के मर गया था. दवाई कराता भी कौन, गांव में किसी की हैसियत ही नही थी जो रामभरोस द्वारा मरवाए गये आदमी की दवाई करवाये, और रमदिनवा को रामभरोस की बखरी से कुछ मिलना जुलना नहीं था, बखरी नाराज तो नाराज फिर किसकी हिम्मत जो एक कदम भी आगे बढ़ता. बेचारा रमदिनवा तड़प तड़प कर मर गया.
रमदिनवा ही क्यों बहुत सारे लोगों को रामभरोस ने खुद मारा पीटा है, या तो अपने लठैतों से मरवाया पिटवाया है. किसी को भी मरवाने पिटवाने के लिए रामभरोस का इशारा ही काफी है.
कुछ दिन पहले की ही तो बात है रमचेलवा का धान ही लवा ले गये, अपने खलिहान में दवां भी लिए, वह बेचारा हिम्मत जुटा कर थाने पर गया फिर भी रामभरोस का रोआं तक टेढ़ा नहीं हुआ. किसे नहीं मालूम कि रामभरोस जब जैसा चाहते हैं कर गुजरते हैं. परधान के चुनाव में शोभनाथ पंडित उनके खिलाफ खड़े क्या हो गये कि आफत आ गई, बेचारे का घर बार ही उजड़ गया, भाइयों में बटवारा हो गया, इतना ही नहीं रामभरोस के मन की जलन तब हल्की हुई जब शोभनाथ का खलिहान आग के हवाले हो गया. सारा अनाज जल कर भसम हो गया. पूरा गांव तमाशा देख रहा था और शोभनाथ का खलिहान जल रहा था.
गांव में कोई माई का लाल नहीं जो रामभरोस की मर्जी के खिलाफ उनके सामने ही नहीं पीठ पीछे भी बोल दे.
फेकुआ को पीछे का ख्याल कर पसीना छूटने लगा
‘सरकार हमसे गलती होय गयल, भला आप बड़हर अदमी, हर काहे जोतब, हमरे गलती पर धियान जीन देब सरकार!’
पास ही में बिफना भी था, वह भी रामभरोस से माफी मांगने लगा पर रामभरोस का माथा काहे ठंडा होता... वे गरम हो गये और भावी दुर्घटनाओं की तरफ इशारा करने लगे. समूचा लील जाने के तर्ज पर उन्होंने फेकुआ को देखा जबकि फेकुआ और बिफना दोनों सम्मिलित रूप से माफी मांग रहे थे.
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रामभरोस तो रामभरोस, समय को मुठ्ठी में बांध कर रखने वाले, उस समय
कुछ नहीं बोले, रास्ता पकड़े और सीधे बखरी की ओर वापस हो लिए.
रामभरोस के लौट जाने के बाद बिफना फेकुआ को सीख देने लगा, वही सीख जिसे उसने बाप दादों से सीखा था. उसने सीखा था कि बड़ों से ऐंठ कर नहीं बोलना, बतियाना चाहिए. बिफना ने फेकुआ को डांटा...
‘तोय कुछ नाहीं बुझते, भला सरकार से अइसे बतियावल जाला, तोसे का मतलब, ऊ हल जोतंय चाहे न जोतंय, ओन्हय चलले हऽ पढ़ावै.’
फेकुआ का करता, उसे जो बोलना था बोल चुका था बोली और गोली वापस तो होती नहीं. अपराधी की तरह बिफना की खरी खोटी सुनता रहा बाद में उसने अपना गुस्सा बैलों पर उतारा. पैना पर पैना पीटे जा रहा था बैलों को, उसे लगता कि वह हल में जुते बैलों को नहीं रामभरोस को ही मार रहा है. सतघरिया होते ही दोनों ने हल जोतना बन्द कर दिया तथा घर की ओर वापस हो लिए.
घर बहुत दूर नहीं था, दोनों कुछ ही देर में घर पहुंच गये. अभी सूरज डूबा नहीं था सो हर तरफ उजाला था.
खेत पर हल जोतते समय जो कुछ हुआ था सारा कुछ बिफना ने फेकुआ के बाप औतार से बता दिया..
फिर तो औतार फेकुआ पर लाल लाल हो गये..


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