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जंगल दंश

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  जंगलदंश यह आख्यान नहीं, कथा है,  आइए देखते हैं, कथा के अलावा और क्या है? जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ताप्रबंधनके लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है? वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भलमानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान होगा भी क...

सहपुरवा

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‘का रे! बिफना रापटगंज में कवि सम्मेलन हवइ, चलबे के नाहीं, चलु बुड़बक हमहूं चलब, देखु परसाल बुल्लू के बिरहवा में केतना मजा अयल रहऽल, कवि सम्मेलनवा में तऽ ओहू से ढेर मजा आई’ ‘का सोचत हए आर! बोलते काहे नाहीं....’ फेकुआ हल जोतते हुए बिफना से सवाल पूछ रहा था. बिफना भी उसके साथ हल जोत रहा था, उसने तत्काल हल चलाना बन्द कर दिया और बैलों की जोड़ी को खेत के एक किनारे खड़ा किया, बैलों को सहेजा भी...  ‘होर्र होर्र..’ फिर जेब से सुर्ती निकाल कर मलने लगा.  ‘संघी लोगन अइसहीं खड़ा रहऽ कहीं भागा जा जीन’  फेंकुआ ने बैलों को सहेजा, फिर बिफना से ... ‘हां रे बिफना परउ साल तऽ कवि सम्मेलनवा भयल रहऽल. जोखुआ कहत रहऽल के बड़ा मजा आयल रहऽल, हं रे चलऽल जाई, काहे न चलऽल जाई’ तीन चार बार सुर्ती ठोंक ठाक कर बिफना ने सुर्ती वाली हाथ की गदोरी फेकुआ की तरफ बढ़ा दिया. फेकुआ बिफना की गदोरी में से सुर्ती निकाल ही रहा था कि गांव के माने जाने मुखिया रामभरोस आ गये. रामभरोस खेतों की निगरानी के लिए निकले थे. सुर्ती मुंह में डाल कर फेकुआ ने रामभरोस से पूछा.. वह उन्हें चिढ़ाना चाहता था. अब पहिले वाला जमाना नाहीं है कि मजू...

तीसरा रास्ता

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मौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास  तीसरा रास्ता   नन्द किशोर नीलम  एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो.आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ ;बाउन्ड्री का काम खेत की रखवाली करना होता है पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन,जी,ओ, ओ की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास तीसरा रास्ता यही संशय उमड़ता.घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन,जी,ओ, का कर्ताधर्ता डी.बी़. जैसा शातिर व्यक्ति जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है वह कहता है क्रान्ति एक...

दूसरी आज़ादी

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कितनी लड़ाइयां कितनी बार ‘रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास  'दूसरी आज़ादी’  सुरेश पंडित  ‘इतिहास तो हर पीढ़ी लिखेगी/बार बार पेश होंगे/मर चुके/जीवितों की अदालत में/बार बार उठाए जायेंगे/कब्रों में कंकाल/हार पहनाने के लिए/ कभी फूलों के/कभी कांटों के/समय की कोई अंतिम अदालत नहीं/और इतिहास आखिरी बार नहीं लिखा जाता।’ पंजाबी कवि सुरजीत पातर की कविता का यह हिन्दी अनुवाद इतिहास के बारे में फैलाए गये बहुत से मिथकों का खंडन करता है। कोई भी इतिहास समग्रतः सच्चा नहीं होता। इसलिए वह बार बार लिखा जाता है। बार बार गड़े मुर्दे उखाड़ जाते हैं और उनकी कारनामों पर समय की अदालत में फैसले लिए जाते हैं। रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘दूसरी आज़ादी’ भी इस सच को पकड़ने की एक बेचैन कोशिश है। शीर्षक से जाहिर होता है कि इसमें उस पहली आज़ादी के बाद का इतिहास है, जिसे पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में काफी संघर्षो और कुर्बानियों के बाद हासिल किया गया था। उसके बाद आज तक सŸाा के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ी गई हैं और आगे भी लड़ी जाती रहेंगीं क्योंकि सŸाा चाहे सामंतशाही की हो या लोकतांत्रिक उसका चरित्र प्रायः एक सा होता है। इसलिए इस...

पट्टा चरित

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                                                                    contact---7376900866 पट्टा चरित(रामनाथ शिवेंद्र) भूमि आवंटन के संघर्ष की औपन्यासिक गाथा  पट्टा चरित उपन्यास के बारे में कुछ कहना, न कहना दोनों बराबर है। उपन्यास खुद आपसे संवाद करेगा, संवाद ही नहीं प्रतिवाद भी करेगा तथा अपने सृजन के बारे में बाजिब बयान भी देगा तथा बताएगा कि मौजूदा शदी में भी इस उपन्यास की जरूरत क्या है? वैसे यह बता देना लेखकीय औचित्य है कि इसकी कथा आठवें दशक में ही उपन्यास का रूप धर कर ‘सहपुरवा’ उपन्यास के नाम से मेरे मित्रों के सहयोग से प्रकाशित हो चुकी थी। वह मेरा पहला औपन्यासिक प्रयास था। इसमें पात्रों के संवाद की भाषा हिन्दी तथा भोजपुरी बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर वाली नहीं थी बल्कि ठेठ बनारसी या बिजयगढ़िया थी। संवाद के अलावा सारा कुछ खड़ी बोली में था। तो कथा पुरानी है आपात काल के आस पास की। सवाल है कि पुरानी कथा को फिर से क्यों...

ढूह वाली लछमिनिया

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विस्थापित होते समय का दस्तावेज  रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास ‘ढूह वाली लछमिनिया’   अमरनाथ अजेय   यह दौर कठिन समय का है। इस समय में चुनौतियां चा रो तरफ से हैं, कुछ खतरे बाहर से हैं तो कुछ भीतर से। जहां तक खतरों की बात है खासतौर से ये सोनभद्र जैसे आदिवासी बहुल जनपद में अन्य जनपदों की तुलना में कुछ ज्यादा ही हैं। लेकिन जो खतरे अपने लोगों से हैं वे कहीं अधिक त्रासद हैं, चिंतनीय है। आज के बाज़ारवादी समय का दबाव जंगल व जंगल भूमि पर ज्यादा है, और ये दबाव बनाने वाले कोई और लोग नहीं हैं, बल्कि अपने हुक्मरान हैं, अपने अफसर हैं, अपने कानून हैं। जो जंगली मानुष अपनी जमीन और जंगल से विस्थापित हो रहा है उसके लिए खतरा केवल जमीन का ही नहीं है बल्कि संस्कृति और सम्मान का भी है, अस्तित्व बचाने का भी है। ऐसे दुरूह समय का दस्तावेज है रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘ढूह वाली लछमिनिया’। लछमिनिया समामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक खतरों से घिरे हुए एक आदिवासी परिवार की युवा लड़की है। लछमिनिया की चिंता में केवल अपनी देह ही नहीं है उसकी चिंताओं में भीखू काका की जमीन है, तो वह पीड़ित ...