तीसरा रास्ता




मौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास 
तीसरा रास्ता 
 नन्द किशोर नीलम 
एन.जी.ओ. की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ओ. ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो.आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ ;बाउन्ड्री का काम खेत की रखवाली करना होता है पर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तो! संभवतः एन,जी,ओ, ओ की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास तीसरा रास्ता यही संशय उमड़ता.घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन,जी,ओ, का कर्ताधर्ता डी.बी़. जैसा शातिर व्यक्ति जिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैं शोषक व भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश के समाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है वह कहता है क्रान्ति एक छलावा है तथा विकास यथार्थ वह आगे कहता है--- वुद्धि  के व्यापार के लिए किसी एन.जी.ओ. का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली--- पृ..21 इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बी. राजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है। उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई न कोई स्त्री हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती है जो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धति बाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी,ण्बी,ण्की सहायक मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्री की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधा अस्मिताए नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्री पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्री जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों ;देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करनाद्ध पर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्री पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है। यह उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्यशोषितोंए पीड़ितोंए दलितोंए दमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जलएजंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निष्क्रिय और उदासीन हैए लगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी.विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन. ण्जी.ओ. इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें..... आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.ओ. संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्र की हत्या कर दी है--- पृ..224 एन.जी.ओ. वाले बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते है---आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं पृ.198 समाज बदलने के व्यापक उद्दश्यों को छोड़कर| ष्ये एनण्जीण्ओण् वाले गरीबीए भुखमरीएबीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका व इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ. 198 इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता हैए दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी.छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जलए जंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जनसहभागिता से बनवाये जा रहे बंधी निर्माण से खुश नहीं हैए उसके धन व वर्चस्व का सारा खेल बड़े बांध खड़े होने में है। वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिसघ् नेताए और स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधाए विजयकीर्ति भाईए निखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाएघ् लेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक सŸारवर्षीय 70 years वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा में करमा गा गा कर नाचने लगता है। पृ..222। यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डरए हताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने.मारने पर उतारू हैं। इस उपन्यास का शीर्षक तीसरा रास्ता देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह उपन्यासकार भी एक ष्तीसरा रास्ताष् बनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सत्ता और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंड तीसरा रास्ता में करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश भट्टाचार्य ;डी.बी. का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवानाए हत्या की राजनीति का पैरोकार होनाए बाद में एन.जी.ओ. चलाना और अपने भ्रष्ट व्यभिचारी चरित्र को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अब ष्तीसरा विकल्पष् या ष्तीसरा रास्ताष् बचा हैघ् क्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा है क्या सघंर्ष और प्रतिरोधी चेतना पर धनष् और आध्यात्म ने आधिपत्य कायम कर लिया हैघ् क्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्र फलीभूत हो चुका हैघ् ऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास की जय है या पराजय तनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा। डीण्बीण् का सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन.दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियों संघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वही ष्तीसरा रास्ताष् तो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया हैघ् बहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुए तीसरे रास्ते का घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म ;घ्द्धही हो सकता हैए जहां न तर्क चलता है न कानून। यहां तमाम धार्मिक व कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारे और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं। इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव व ऊभ.चूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता है यही इस उपन्यास की सफलता है। उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत न होगा। हम साकारी विधानों कानूनों परंपराओं के तार्किक व प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैं इस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं...33 अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह खूनी क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटोए खाना दोए पढ़़ाओए दवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं-- पृ35 ष्डीण्बीण् को स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुई क्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ था उसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड पृ...39 ष्तुम्हारा नाम प्रवीण हैए तूं एन.जी.ओ. चलाता हैए तूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता--- पृ.64 वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित न थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग रूप धारण करना उसका स्वभाव है। पृ.106 ष्सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सकेष् पृ..116 ष्बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेग| यदि लाभए अतिरिक्त लाभ वाली व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्र व प्रबंधन से तोड़ दिया जाएए इससे नौकरशाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है। प्रतिरोध कार्यक्रम खुला खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दानए प्रतिदानए बैंक कर्जों के आवंटनए दया व कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं। संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकरए क्रय शक्ति बढ़ा करए अवसरों में समानता का वातावरण बना करए सामाजिक मर्यादा बहाल कर उत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर... पृ..193 ष्आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैंए जमीन में कोयलाए हीराए सोनाए चॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ोए हमेशा उजड़ते रहोए हमारा कुछ भी नही ऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहींए हमारा भी हक़ है इस माटी परए इस जंगल परए अब हम इसे कटने नहीं देंगेए जंगल का फल.फूल बालू मिट्टी सारा हमारा हमें नहीं चाहिए दिल्ली पृ..224 ष्यहां आकर इतिहास मरे न मरे पर विज्ञानए राजनीतिए दर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्र में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं-- पृ227 हंस कथा मासिक फरवरी 2010 पृ..84.85 समीक्ष्य कृति तीसरा रास्ता पिलग्रिम्स पब्लिकेशन्स वाराणसी





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