रामनाथ शिवेन्द्र के उपन्यास

रामनाथ शिवेन्द्र के उपन्यास

   सीमांत की संघर्ष गाथा रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास हरियल की लकड़ी
                             अरविन्द चतुर्वेद

दुनिया के जिस ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ में हम रहते हैंआज़ादी के अठ्ठावन साल बाद आज भी सीमांत पर कई ऐसी जिन्दगियां हैं जिन्हें आज़ादी की रोशनी मयस्सर नहींउलटे तंत्र के शिकंजे में वे छटपटा रही हैं। विकास की संजीवनी तो खैर उन्हें क्या मिलेविडंबना ही है कि विकास की मार ने उनका जीना दूभर कर रखा है। ये सीमांत के दूर-दराज के जंगली गॉव भी हो सकते हैं और शहरों की झुग्गी-झोपड़ियां या फुटपाथी जिन्दगी भी।
कथाकार रामनाथ शिवेन्द्र के हाल ही में आये उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में जिस तरह से सीमांत की जीवन गाथा उपस्थित हुई है वह भौगोलिक रूप से भी त्त रप्रदेश का दक्षिणीपूर्वी सीमांत है। सोनभद्र जनपद के रूप में वही सीमांत है जो कोयलासीमेन्टअल्युमिनियम की बदौलत औद्योगिक अंचल और बिजली कारखानों के चलते ऊर्जा राजधानी जैसे चमकदार जुमले से संबोधित किया जाता है तो दूसरी ओर इसी सीमांत पर विकास की मारीविस्थापन से धकियाई हुई वह ग्रामीण जंगली बस्तियां हैं जो अपने  विकास में अचल हैं और प्रशासनिक अंधेरगर्दीलूट,खसोट तथा बहुस्तरीय दैहिक मानसिक शोषण की स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं। छब्बीस उपशीर्षकों में विन्यस्त उपन्यास ‘हरियल की लकड़ी’ में इसी ग्रामीण आदिवासी ज़िन्दगी की संषर्ष गाथा को उसकी अनेक गूंज अनुगूंज के साथ प्रस्तुत किया गया है। कहना  होगा कि बहुत हद तक इसमें उपन्यासकार को सफलता मिली है।
वैश्वीकरण के जिस अभियान में विकास की दुदुभी बजाई जा रही है उसकी असलियत जाननी हो तो सीमांत के परिवेश का जायजा लेने से खोखलापन अपने आप उजागर हो जाता है। इस उपन्यास में आये गॉव का जीवन परिवेश देखिए...
सदी का गुज़रना इस गॉव से गायब था। यहां परंपरायें थींउनका दबाव था। दूसरी कोई चीज थी तो वह था जंगलनदी नाले पहाड़। जंगल में महुआकरवनबेरहर्राबहेरा जैसे कुछ जंगली फल फूल थे। जिन्हें अपने उपयोग के लिए प्रयोग में लाना कानून प्रतिबंधित और दण्डित करता था। गॉव हजारों साल की परंपराओं में कुछ इस तरह ढंका था कि नई सदी का कहीं अतापता  चलता था। एक तरफ धॉगरी बोलते हुए करम देवता खड़े थे तो दूसरी ओर मैदानी इलाके में रामकृष्णशंकर जैसे देवता भी पुजहाई करवाने में कम  थे। हाल के सालों में कुछ नेताओंपरेताओं के नाम भी गॉव में घुस चुके हैं। (पृ.68)
उपन्यास की मुख्य कथा तो बस इतनी ही है कि चेरो जाति की आदिवासी युवती बसमतिया का पति जगदा पॉच साल पहले गॉव छोड़कर कहीं चला गया है।  वह लौटा उसने इस बीच अपनी कोई खबर दी। लेकिन बसमतिया है कि अपनी बूढ़ी विधवा सास के साथ रह कर मेहनत मजूरी करते हुए ज़िन्दगी बसर किये जा रही है। वह जवान हैआकर्षक हैमेहनती हैऔर चाहे तो अपने जाति समाज के मुताबिक किसी दूसरे युवक के साथ ‘सलट’ कर ज़िन्दगी की नई पारी भी शुरू कर सकती है। लंकिन वह जगदा के लौटने का इन्तजार करती है। जगदा वापस  जाये इसके लिए ‘छठ’ का ब्रत रखती है, ‘करम’ देवता से मनौती करती है। वह जगदा और उसकी स्मृतियों को हारिल की लकड़ी की तरह थामेे हुई हैजकड़े हुई है।
सीमांत की ज़िन्दगी का अर्थिक संघर्ष कितना गहरा है उपन्यास में आया विवरण द्रष्टव्य है...
चेरवान के परिवारों की संख्या चालीस थी तथा धॉगर कुल पैंतालिस परिवार थेअहीर जो लगभग भूमिहीन थे उनकी संख्या चार परिवार की थी। भूमिहीन  गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले इन परिवारों के बच्चे स्कूल  जाते थे।.... बहुतायत लोगों के पास बंधी में ली गई जमीनों के एवज में चौदह चौदह बिस्वों के दिए गये छोटे छोटे जमीन के टुकड़े थे। गॉव के भूमिहीन जंगल विभाग के कामों पर सब्बलगैंताफावड़ा चलाते और औरतें टाकरियॉ ढोतीं। कभी जंगल में वृक्षारोपण का काम भी मिल जाता।लेकिन जिस बसमतिया की जिन्दगी दागों वाली दुनिया की  थीवह जल की तरह चमकदार थी और पारदर्शी भी। पृ..54
उसकी स्थिति दूसरों से इस मायने में भिन्न है कि आर्थिक अभाव के साथ ही उसका जीवन भवनात्मक अभाव से भी ग्रसित है। इसलिए यह बहुत ही स्वाभाविक है कि
बसमतिया वर्तमान में जीने वाली औरत थी। उसके पास  तो अतीत की आनददायक स्मृतियॉ थीं और  ही भविष्य का मनोरम सपना था’ पृ..127
तो क्या बसमतिया के अन्दर इच्छा-आकांक्षा  थीराग-अनुराग  थाया वह हाड़-मांस की नहीं बनी थीरात के एकांत में अपनी मायके में भउजाई के साथ सोई बसमतिया कहती है...
भउजी जबसे तुम्हारा ननदोई भागा है तबसे जाने क्या हुआ कि मेरी देह भी उसके साथ चली गई है। समझ में नहीं आता कि देह कैसे चली गईमेरी खुशियां लेकर.... मुई देह भी गुसिया गई है मुझ पर... पृ..52
यानि एक तरह से पति परित्यक्तायुवा बसमतिया जिस तरह की परिस्थितियों का शिकार हैउसमें किसी भी तरह उसकी ज़िन्दगी निरापद नहीं है। वह जिस मालिक के काम पर जाती हैएक मौका पाकर वह उसे दबोच लेता है। संघर्ष करके बसमतिया उसके चंगुल से निकल भागती हैऔर दुबारा फिर उसके काम पर नहीं जाती। बसमतिया के जेठ की भी उस पर बुरी निगाह है। अव्वल तो वह चाहता है कि बसमतिया किसी के साथ ‘सलट’ कर दफा हो जाये तो जगदा के हिस्से की जरा सी जमीन उसे मिल जाये या फिर बसमतिया उसके अवैध संरक्षण में रहने लगे। लेकिन बसमतिया कठिन जिन्दगी जीते हुए भी टूटती नहीं। यथासंभव न्यूनतम जरूरतों और शर्तों पर जिन्दगी जीती है
लेकिन जेठ तथा मालिक जैसे बदनीयत लोगों के लिए वह सर्वथा अलभ्य बनी रहती है।
बसमतिया का पति भगोड़ा निकला जरूर लकिन बसमतिया परिस्थितियों के अंधड़ में सूखे पत्तों  की तरह उड़ जाने वाली स्त्री नहीं है। उसका जीवन रिक्त है और उसकी मनस्थिति को बड़ी बारीकी से उकेरने में लेखक ने पर्याप्त दक्षता का परिचय दिया है पर असल चीज है बसमतिया का जीवटवह चट्टानी दृढ़ताजो हर तरह के आर्थिकमानसिक हरहराते अभावों के आगे पराभूत होना नहीं जानती। इसी ने बसमतिया के व्यक्तित्व को चमकदार बनाया है। लेकिन यहां यह कहना भी जरूरी है कि ‘हरियल की लकड़ी’ उपन्यास को स्त्री विमर्श के खाते में डालकर ‘रिड्यूस’ नहीं किया जा सकता। दरअसल यह उपन्यास सीमांत की जिन्दगी जी रहे लोगों के संघर्ष और जिजीविषा की बिडंबनापूर्ण दास्तान तो है हीसाथ ही बचे खुचे सामंती अवशेषपूंजीवाद के हमलावर चरित्र और जनतंत्र को अप्रासंगिक बनाने पर आमादा भ्रष्ट,क्रूर प्रशासनिक व्यवस्था तथा विकास की इकहरी प्रक्रिया के दुःपरिणामों को उजागर करता एक खौलता कथा-दस्तावेज भी है।
बसमतिया उपन्यास का केन्द्रीय पात्र तो है लेकिन एक ऐसा पुल भी है जिस पर से होकर उसके मायके और ससुराल की ग्रामीण जिन्दगी की सीमांत चुनौतियां और संघर्ष अनेक रूपों में आवाजाही करते हैं। उसके बाप ने कभी सरकारी सहायता के तहत भैंस ली थी जिसके एवज में देय बैंक का कर्ज दो हजार से बढ़कर आठ हजार रुपये हो जाता है। यह कर्ज भी एक नेता की कागजी धोखा धड़ी की देन है जिसका शिकार 
उसका अनपढ़ बाप बनता है। बाप को जेल  जाना पड़े और किसी तरह कर्ज से छुटकारा मिले इसके लिए गॉव के सीधे सादे दूसरे कर्जदारों के साथ बसमतिया को बैंक और कचहरी का चक्कर लगाना पड़ता है। बसमतिया की गॉव की सहेली ननकी का दूर का एक रिश्तेदार देवनाथ डूबते को तिनके का सहारा जैसा वकील मिल जाता है और हालांकि बसमतिया का बाप जेल जाने से बच जाता हैउपभोक्ता फोरम के माध्यम से मुकदमा जीतने के कारण उसे कर्ज से मुक्ति भी मिल जाती है। फिर भी रोज कमाने खाने वालों के लिए बैंक कचहरी का चक्कर अपने आप में कितना बड़ा संघर्ष हैयह वकील देवनाथ से बसमतिया की इस जिज्ञासा  चिन्ता से समझा जा सकता है....
फैसला कब तक हो जाएगा वकील साहबयहां आओ तो सत्तर  अस्सी रुपया खरच हो जाता हैदो दिन का नुकसान अलग से। रोज कमाओ खाओ नहीं तो फांका...पृ..159
प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लूटतंत्र का शिकार होकर सरकारी अनुदानसहायता और बैंक कर्ज आदि के जरिए सीमांत की जिन्दगियां जहां जाल में फंसकर छटपटाती हैंवहीं औद्योगिकरण और इकहरे विकास की प्रवंचना भी उन्हीं के हिस्से आती है।...
गॉव के आकाश का सूरजगॉव के हिस्से की जमीनधूप हवाजंगलपहाड़ सभी कुछ गॉव में होते हुए भी गॉव से बाहर थे उन पर दूसरों का कब्जा था। नदी का पानी दूर जाकर नहर में गिरता था जिससे गॉव का रिश्ता नहीं। गॉव का पहाड़ टूट टूट कर ढोंकापटियाचूनासीमेन्ट
अल्युमिनियम बनता थाजंगल कटकर पलंगकुर्सी,मेजकिवाड़ वगैरह में ढलता था पर बसमतिया का मायका.... बिना नहर वालाबिना कुर्सी वालाबिना सीमेन्ट वाला था जो आज भी है। इतिहास की बनती बिगड़ती स्थितियों ने कभी भी इस गॉव का भला नहीं किया’ पृ...73-74
उपन्यास का अंत सचमुच विचलित कर देने वाला है। गॉव के पंडितों के मन मुताबिक ग्रामसभा का काम  होने के कारण वे भूमिहीनों और मजदूर तबके के लोगों का साथ देने वाले ग्रामप्रधान के खिलाफ हैं। अंततः गॉव के भूमिपति यानि पंडित वन विभाग के रंेजर के साथ 
मिलकर प्रधान  भूमिहीन ग्रामीणों के खिलाफ साजिश रचते हैं। रेजर की अगुवाई में वन विभाग वाले जंगल की जमीन पर कब्जा का बहाना बना कर उनकी झोपड़ियां उजाड़ते हैंआग लगा देते हैंविरोध करने वालों को खदेड़कर पकड़ ले जाते हैं। रेंजर आफिस पर खुद लकड़ी के गोदाम में आग लगवाकर रेजरगॉव वालों को आरोपी बनाता है। यह सारी र्काावाई रात में होती है। बसमतिया और रज्जो के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। इस बर्बर दमनात्मक कार्रवाई के बाद प्रधान समेत पकड़े गये ग्रामीणों को गिरफ्तार कराके जेल भेज दिया जाता है। पक्ष विपक्ष में खबरे छपती हैंेचूंकि वकील देवनाथ भी ग्रामीणों को भड़काने के आरोप में गिरफ्तार होता है इसलिए वकीलों की हड़ताल और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के धरना प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक बार फिर मामला जॉच और कचहरी की पेचीदा गलियों में चला जाता है। विचलित कर देने वाले दमन और षडयंत्र के गर्भ में जिस तरह के विस्फोट के मुहाने पर जाकर उपन्यास खत्म होता है
वहां हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और इसकी उपलब्धियों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह स्वयमेव खड़ा हो जाता है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के गाए जा रहे भारतीय सोहर के सामने यह उपन्यास एक ऐसा शोकगीत है जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता।
परिचय... अंक 06 पृ...107-110
हंस...
समीक्ष्य कृति... हरियल की लकड़ी’ (उपन्यास)
प्रकाशक.. राजकमलदिल्ली
सन्... 2006
    

  
मौलिक अधिकारों के संषर्ष की तैयारी रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास तीसरा रास्ता
                                      नन्द किशोर नीलम
एन.जी.की भूमिका पर अनगिनत सवाल उठते रहे हैं। एन.जी.ने अपनी कार्यप्रणाली और समग्र व्यवहार से बराबर ऐसे हालात पैदा किए हैं जिससे तमाम धारणायें पुष्ट और प्रमाणित हुई हैं कि इनकी भूमिका विकास विरोधी दलालों की तरह है। निरीह जनता के हिस्से की कल्याणकारी योजनाओं की अकूत राशि इनके पंचतारा ऐशो आराम पर खर्च कर दी जाती है। बाड़ (बाउन्ड्रीका काम खेत की रखवाली करना होता हैपर यदि बाड़ ही खेत खाने लगे तोसंभवतः एन.जी.ओज की भूमिका पर अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले रामनाथ शिवेन्द्र के महत्वपूर्ण उपन्यास ‘तीसरा रास्ता’ में यही संशय उमड़ता घूमता रहता है। मानवाधिकार जन समिति की एन.जी.का कर्ताधर्ता डी.बी़ जैसा शातिर व्यक्तिजिसके हाथ में समाज को बदलने की ताकत और साधन दोनों हैंशोषक  भक्षक की भूमिका में है। समाज की बेहतरी के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले साधनों को वह समाज के विनाश केसमाज की चेतना को कुंद करने के हथियारों के रूप में तब्दील करने में माहिर है...वह कहता है...
क्रान्ति एक छलावा हैतथा विकास यथार्थ’  वह आगे कहता है...
बुद्धि के व्यापार के लिए किसी एन.जी.का होना आवश्यक था सो उसने अमेरिकी फन्डर की बात जस के तस मान कर अपनी संस्था बना ली’  पृ..21
इसलिए क्रान्ति को अवरूद्ध करने के तमाम उपाय करता हैै। डी.बीराजनीतिक समीकरण बिठाने में माहिर है।उसके मंसूबों को साकार करने और उसके अटके कामों को करवाने के लिए कोई  कोई स्त्री हमेशा देह में परिवर्तित हो जाने को तत्पर रहती हैजो उसका विरोध करती है उसे वह बर्बाद कर देता है। जटिल जीवन पद्धतिबाजारीकरण और घिचपिच सौन्दर्यबोध से स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व किस तरह संचालित होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है डी.बीकी सहायक मधुनिहलानी और शालिनी। वस्तुतः यह उपन्यास समाज परिवर्तन की दिशा में स्त्री की भूमिका के परस्पर विरोधी आयामों की गहरी पड़ताल करके उसके सही और सकारात्मक भूमिका और हस्तक्षेप को सुधाअस्मिता
नन्दिता तथा प्रमिला जैसी स्त्री पात्रों के द्वारा रचता है जो हर स्तर पर समाज बदल के लिए प्रतिरोधी क्षमता का प्रतिनिधित्व करती हैं। स्त्री जीवन के दो घनघोर विरोधी स्वरूपों (देह में तब्दील हो जाना एक स्वरूप तथा विरोधी स्वरूप अपनी अस्मिता के बचाव में प्रतिरोध करनापर रामनाथ शिवेन्द्र ने स्त्री पात्रों के माध्यम से गंभीर विचारण किया है।
यह उपन्यास सोनपुर जनपद की आम जनता के माध्यम से आज के असंख्यशोषितोंपीड़ितोंदलितोंदमितों और वंचितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्ष की कथा कहता है। सोनपुर के ये लोग अपने जल,जंगल और जमीन के हक़ के लिए लगातार ठगे जा रहे हैं। शासन इनके प्रति निष्क्रिय और उदासीन हैलगभग जनविरोधी और विकास विरोधी भूमिका में। वन विभाग इन पर झुठे मुकदमे दायर करवाकर क्रूर हत्यारे की तरह व्यवहार करता है और उनके मौलिक अधिकारों की हिफाज़त की लड़ाई के लिए देशी-विदेशी फंडरों से करोड़ों रुपये डकारने वाले एन.जी.इनके सामाजिक तथा मौलिक अधिकारों का सबसे बड़े अपहर्ता हैं। देखें...
आर्थिक उदारवाद तथा एन.जी.संस्कृति ने आन्दोलनों के चरित्र की हत्या कर दी है’ पृ..224
एन.जी..वाले.बेकारी तथा बेरोजगारी का लाभ उठाते हैं तथा रुपया कमाने का व्यापार करते हैं....आधे से भी कम मजूरी पर कार्यकर्ताओं का शोषण करते हैं पृ..198
समाज बदलने के व्यापक उद्दश्यों को छोड़कर...ये एन.जी.वाले गरीबीभुखमरी,बीमारी का सौदा करते हैं तथा अमेरिका  इंग्लैंड को बेचते हैं। पृ..198
इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण घटना है सुधा के नेत्त्व में सोनपुर में बंधी का निर्माण जो वास्तव में आज के समय में जनभागीदारी के द्वारा जल संरक्षण के श्रोतों को सिरजने के पहल के लिए प्रेरित करता हैदूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार द्वारा बड़े बांध बनाने के लिए अपनी जमीन से उजाड़ दिए जाने वाले निरीह आदिवासियों के विस्थापन को रोकने तथा बड़े बांध के विकल्प में छोटी-छोटी बंधियां बनाकर प्राकृतिक रूप से जल संरक्षण करने से जलजंगल और जमीन रूपी आम जनता के मौलिक अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और उन्हें बार बार उजड़ने से निजात भी मिलेगी पर वन विभाग सुधा द्वारा जनसहभागिता से बनवाये जा रहे  बंधी निर्माण से खुश नहीं हैउसके धन  वर्चस्व का सारा खेल बड़े बांध खड़े होने में है।
वन विभाग के पैमाइशी फीते का जाल इतना गहरा और बड़ा होता है कि आम आदमी और उसके जीवन जीने के संसाधन भी इसी जाल में उलझकर रह जाते हैं। प्रतिरोध करने पर वन विभाग का दमन चक्र क्रूरता में बदल जाता है फिर पुलिसनेताऔर स्वयं सेवी संगठनों के भ्रष्ट आका आपसी साठगांठ से जनप्रतिरोध की धार को कुन्द कर देते हैं। उपन्यास में सोनपुर के निरीह लोगों को रेंजर की हत्या के आरोप में फसाना ऐसी ही सांठगांठ का परिणाम है। सुधाविजयकीर्ति भाईनिखिल दा और विनय जैसे लोगों की बड़ी चिंता यह है कि इन्हें किसी भी तरह से उजड़ने से बचाया जाए और विस्थापित किए जाने वाले लोगों के बीच जाकर उन्हें आदिवासियों के मौलिक स्वत्व के संघर्ष के लिए कैसे तैयार किया जाएलेकिन अनेक बार उजड़ चुके और शासन और पुलिस की पाश्विकता को भोग चुके लोग डरे हुए हैं। गॉव का एक Ÿारवर्षीय वृद्ध सुधा और विनय को इस बर्बरता के बारे में बताते हुए लगभग पागलपन की हद तक पहुंच चुकी निराशा में ‘करमा’ गा गा कर नाचने लगता है। पृ..222 यह बुजुर्ग आदिवासी बार बार के विस्थापन को अपनी नियति मान चुका है। जिस डरहताशा और निराशा का वह शिकार है वह आज पूरे भारतीय समाज पर हावी है। पर इसी गॉव के कुछ युवा लोग इस नियति को बदलकर आपने जीने के अधिकार को पाना चाहते हैं। इनमें अथाह जोश है और प्रतिरोध की आवश्यक क्षमता भी। ये अब मरने-मारने पर उतारू हैं।
इस उपन्यास का शीर्षक ‘तीसरा रास्ता’ देख कर ऐसा लगता है कि राजनीति में तीसरे विकल्प की तरह  उपन्यासकार भी एक ‘तीसरा 
रास्ता’ बनाने या सुझाने की पहल करेगा जो कायम सत्ता और विकास विरोधी स्वयं संगठनों की लूट से परे होगा। जिस तीसरे रास्ते का 
खुलासा रामनाथ शिवेन्द्र उपन्यास के अंतिम ख्ंड तीसरा रास्ता में करते हैं वह चौंकाता है। प्रारंभ में एक क्रान्तिकारी कामरेड रहे दीपेश 
भट्टाचार्य (डी.बी.) का रमेशरा बनकर नन्दिनी के जमीनदार पिता की हत्या करवानाहत्या की राजनीति का पैरोकार होनाबाद में एन.जी.चलाना और अपने भ्रष्ट व्यभिचारी चरित्र को छिपाने के लिए अंततः आध्यात्मिक गुरु बन जाना ही क्या अब ‘तीसरा विकल्प’ या 
तीसरा रास्ता’ बचा हैक्या वास्तव में आज के इस विकट दौर में जनपक्षधर मूल्यों के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा हैक्या सघंर्ष 
और प्रतिरोधी चेतना पर ‘धन’ और ‘आध्यात्म’ ने आधिपत्य कायम कर लिया हैक्या अमेरिकी धनकुबेरों का प्रतिरोधी ताकतों को मनोवैज्ञानिक रूप से अपहृत करने का षडयंत्र फलीभूत हो चुका हैऐसे कई प्रश्नों से यह उपन्यास विचलित करता है। आध्यात्म वास्तव में इस उपन्यास की ‘जय’ है या ‘पराजय’ तनिक गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।
डी.बीका सब तरफ से हार कर अपने पुराने आध्यात्मिक गुरु की शरण में चले जाना और अंत में अपने गुरु की जगह लेकर भगवा धारण 
कर लेना आज के समय की बड़ी सच्चाई है। आध्यात्मिक गुरुओं का प्रभामंडल लगातार फैल रहा है। कई गुरुओं और बापुओं के यौन-दुराचारों का पर्दाफास होने के बाद भी ये अपना प्रभामंडल विस्तृत करने मे कामयाब हो रहे हैं। आज जिस तरह की घटनांए हमारे वैचारिक समाज में घट रही हैं उन्हें देखते हुए यही कहा जा सकता है कि रामनाथ शिवेन्द्र आगत के भयावह हालात की पूर्व सूचना दे रहे हैं। प्रगतिशील और जनपक्षधरता के अगुआओं का इन दिनों जातियोंसंघियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के चंगुल में फसना या स्वेच्छा से उनके आतिथ्य और धन को स्वीकार करना कहीं वही ‘तीसरा रास्ता’ तो नहीं जिसकी ओर रामनाथ शिवेन्द्र ने संकेत किया हैबहरहाल आज के वैज्ञानिक युग में आध्यात्म की दुन्दुभी जिस ऊंचे सवर में कान फोड़ रही है उसे देखते हुए ‘तीसरे रास्ते’ का घातक संकेत हमें सावधान करता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अतिवाद के इस कठिन समय में बड़े बड़े अपराधियों का अंतिम ठौर आध्यात्म (?)ही हो सकता हैजहां  तर्क चलता है  कानून। यहां तमाम धार्मिक  कठमुल्ला ताकतें उनके जयकारे और संरक्षण के लिए तत्पर हैं। इस तथ्य की सच्चाई को हम पिछले सालों देख चुके हैं।
इस उपन्यास के माध्यम से रामनाथ शिवेन्द्र ने घटित हो रही सच्चाइयों पर और बढ़ती संवेदनशीलता पर बहुत कुछ कहने की कोशिश की है। विचारों का भारी दबाव  ऊभचूभ तथा अधिक कथा विस्तार शिथिलता लाता है ऐसी तमाम सीमाओं के बावजूद यह कहने में संकोच नहीं है कि यह उपन्यास व्यापक सामाजिक सरोकारों को बड़े पैमाने पर बहस के बीच लाता हैयही इस उपन्यास की सफलता है।
उपन्यास के कुछ अंश जो विचारण के लिए अनिवार्य जैसे हैं उन्हें यहां प्रस्तुत करना गलत  होगा।...
हम साकारी विधानोंकानूनोंपरंपराओं के तार्किक  प्रतिबद्ध अहिंसक अवज्ञाकारी हैंइस अवज्ञा के दौरान हमें हक़ है कि हम अपनी हिफाजत करें तथा जनता की भी जिसे जागरूक बनाने के लिए हम संकल्पित और लक्ष्यित हैं’ पृ..33
अमेरिकियों का नारा था जिसका पेट भरेगा वह खूनी क्रान्ति नहीं करेगा सो रुपया बांटोखाना दोपढ़़ाओदवाई दो यानि उन्हें बचाओ जो 
खुद मर रहे हैं या प्रायोजित मृत्यु के लिए क्रान्तिकारी बन रहे हैं’ पृ..35
डी.बीको स्वयंसेवी संस्थावाद की इस परिभाषा से पहले कुछ दिक्कत हुईक्यांकि तब तक वह मानसिक रूप से दिवालिया नहीं हुआ थाउसे कदम कदम पर मार्क्स याद आते जैसे रति प्रसंग के दौरान फ्रायड’ पृ..39
तुम्हारा नाम प्रवीण हैतूं एन.जी.चलाता हैतूं गॉव का विकास करेगा खैरात बांट कर। तूं जमीन क्यों नहीं बटवाता? ’पृ..64
वैसे भी वे इतिहास की अश्लील आदतों से परिचित  थे कि वह परिवर्तित होने वाली परिघटना है तथा समय समय पर कई तरह का रंग 
रूप धारण करना उसका स्वभाव है। पृृ..106
सरकार के पास इतनी बड़ी जेल नही जो सभी को जेल में रख सके’ पृ..116
बड़े उद्योगों का विशाल सांचा नहीं बचेगा... यदि लाभअतिरिक्त लाभ वाली व्यवस्था को सहभागितापूर्ण अर्थतंत्र  प्रबंधन से तोड़ दिया जाएइससे नौकरशाही का सांचा भी तोड़ा जाना संभव हो सकता है।
प्रतिरोध कार्यक्रम खुला खुला था यानि कि नई दुनिया संभव है पर दानप्रतिदानबैंक कर्जों के आवंटनदया  कृत्रिम आर्थिक सहयोग के द्वारा नहीं... संभव बनाया जा सकता है बराबरी का दर्जा देकरक्रय शक्ति बढ़ा करअवसरों में समानता का वातावरण बना करसामाजिक मर्यादा बहाल करउत्पादनों को जनोन्मुखी बना कर’ पृ...193
आखिर हम आदिवासी ही क्यों उजाड़े जाते हैंजमीन में कोयलाहीरासोनाचॉदी चाहे जो मिल जाये उजड़ोहमेशा उजड़ते रहोहमारा कुछ भी नहींऐसा नहीं चलेगा। हम कोई लाश नहींहमारा भी हक़ है इस माटी परइस जंगल परअब हम इसे कटने नहीं देंगेजंगल का फल-फूलबालूमिट्टी सारा हमाराहमें नहीं चाहिए दिल्ली’ पृ.....224
यहां आकर इतिहास मरे  मरे पर विज्ञानराजनीतिदर्शन और धर्म सारे के सारे यहां आकर मर चुके हैं इसलिए इस परिक्षेत्र में बारहवीं शताब्दी आज भी जीवित है। इनके चेहरे आज पूंजीवादी बर्बरता के परिणाम हैं’ पृ...227
 हंस कथा मासिक...फरवरी..2010 पृ....84-85
समीक्ष्य कृति... तीसरा रास्ता
पिलग्रिम्स पब्लिकेशन्स वाराणसी

  
कितनी लड़ाइयां कितनी बार रामनाथ शिवेंद्र का उपन्यास दूसरी आज़ादी
                              सुरेश पंडित


 इतिहास तो हर पीढ़ी लिखेगी/बार बार पेश होंगे/मर चुके/जीवितों की अदालत में/बार बार उठाए जायेंगे/कब्रों में कंकाल/हार पहनाने के लिएकभी फूलों के/कभी कांटों के/समय की कोई अंतिम अदालत नहींऔर इतिहास आखिरी बार नहीं लिखा जाता।’ 

पंजाबी कवि सुरजीत पातर की कविता का यह हिन्दी अनुवाद इतिहास के बारे में फैलाए गये बहुत से मिथकों का खंडन करता है। कोई भी 

इतिहास समग्रतः सच्चा नहीं होता। इसलिए वह बार बार लिखा जाता है। बार बार गड़े मुर्दे उखाड़ जाते हैं और उनकी कारनामों पर समय की अदालत में फैसले लिए जाते हैं। रामनाथ शिवेन्द्र का उपन्यास ‘दूसरी आज़ादी’ भी इस सच को पकड़ने की एक बेचैन कोशिश है। शीर्षक से जाहिर होता है कि इसमें उस पहली आज़ादी के बाद का इतिहास हैजिसे पिछली शताब्दी के पूर्वार्ध में काफी संघर्षो और कुर्बानियों के बाद हासिल किया गया था। उसके बाद आज तक के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ी गई हैं और आगे भी लड़ी जाती रहेंगीं क्योंकि सत्ता  चाहे सामंतशाही की हो या लोकतांत्रिक उसका चरित्र प्रायः एक सा होता है। इसलिए इस तरह की लड़ाइयों के क्रम का कभी अंत नहीं होता। उपन्यास में आज़ादी से पहले इसे पाने के लिए लोगों को जिस तरह के आकर्षक सपने दिखा कर संघर्ष हेतु तैयार किया गया था उसका और बाद में उन सपनों को किस तरह तोड़ा गया इसका वर्णन बड़ी संवेदनात्मक भाषा में किया गया है। साथ ही खोई आज़ादी को पुनः पाने के लिए किए गये प्रयासों को भी दर्शाया गया है। लगता है हमारे देश के सारे इतिहास आम लोगों को सपने दिखाने और उन्हें तोड़ने के प्रयासों को ही लेकर लिखे गये हैं। उपन्यास के सभी पात्र चाहे वे नायक हों या खलनायकपहली आज़ादी के संघर्षों की उपज हैं फिर चाहे उन्होंने एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उसमें भाग लिया हो या उसके विरोध में अथवा एक तटस्थ दर्शक के रूप में। नायक इस उपन्यास का रणविजय भी हो सकता हैरामदयाल भी और रामप्यारे भी। क्योंकि तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। ये सब मिलकर एक चरित्र बनते हैं। आज़ादी के बाद इस लड़ाई में शरीक होने वाले लोग दो वर्गों में बट जाते हैं। एक में वे लोग होते हैं जो किसी  किसी रूप में सत्तासे जुड़ जाते हैं। एक में वे लोग होते है जो इससे अलग तो रहते हैं लेकिन आगे क्या करें की दिशाहीनता में गोते लगाते नज़र आते हैं। पहली तरह के लोग गॉधी का मुखौटा लगाकर सत्तासुख भोगने में लग जाते हैं और दूसरेगॉधी की राह पर चलकर आगे क्या किया जा सकता है की सोच में उलझ जाते हैं। रणविजय एक शाही परिवार के सदस्य हैं लेकिन इसलिए महल से निकाल दिए जाते हैं क्योंकि वे एक ऐसी लड़की से प्यार कर शादी कर लेते हैं जो एक अंग्रेज पिता और भारतीय मॉ की संतान है। इसी तरह उनके भाई भैया राजा रियासत में रणविजय को हिस्सेदारी से इस आधार पर वंचित कर देते हैं क्योंकि वे भूतपूर्व राजा की दूसरी पत्नी की संतान हैं अर्थात भाई होकर भी सगे भाई नहीं हैं। यद्यपि दोनों ही आरोप सही हैं फिर भी उन्हें कानूनन उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन रणविजय अपने हक़ के लिए स्वयं लड़ने को तैयार नहीं होते। यह शायद उन पर चले  रहे गॉधी के चिंतन के प्रभावों का परिणाम है या वह भावुकता है जो गॉधी को लेकर बाद तक बनी रही थी।

रामदयाल जी दोनों भाइयों के मित्र हैं वे इस तरह के अन्याय को सहन नहीं कर पाते फिर भी वे  तो भैया राजा का विरोध करते हैं और  ही रणविजय को भैया राजा का विरोध करने के लिए तैयार ही कर पाते हैं। नतीजा यह कि पहली आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के कारण दोनों ही गॉधी के हैंगओवर से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते। वैसे भी यह ऐसे लोगों का स्वभाव है कि वे तब तक कोई निर्णय नहीं लेते जब तक किसी आन्दोलन के लिए पुख्ता ज़मीन तैयार नहीं हो जाती। पहली आज़ादी की लड़ाई में भी शुरू में किसानमजदूर और वंचित वर्ग के लोग ही शामिल हुए थेमध्यम वर्ग तो तब आया था जब वह लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच गई थी।

राजमहल से निष्कासित और पैतृक संपत्ति  से वंचित हो जाने के बाद रणविजय और लिली दोनों लिली के घर आकर रहने लगते हैं। रणविजय एक गंभीर विचारक से दिखाई देते हैं जबकि लिली अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है। शायद यही वह कारण है जिससे वह रणविजय से शादी करती है और जब यह महसूस करती है कि रणविजय उसकी महत्वाकांक्षी प्रकृति को संतुष्ट करने में सहयोगी नहीं बन सकता तो वह नामदेव की ओर झुकती है। रणविजय और लिली के माता-पिता उसके इस झुकाव को पसंद नहीं करते। लेकिन उनकी अनिच्छा के बावजूद लिली अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए नामदेव के साथ रूस चली जाती है। समझ में नहीं आता कि इतनी चंचल चित्त  और महलों में रहने की इच्छा पालने वाली युवती के साथ रणविजय विवाह क्यों कर लेता है। वैसे लिली बौद्धिक रूप से काफी जागरूक हैगंभीर विषयों पर होने वाली चर्चाओं में वह भाग ले सकती है और रूसी साहित्य का अनुवाद तो वह करती ही है। फिर भी वह अथाह प्रेम करने वाले रणविजय और अपने माता पिता को छोड़कर क्यों चली जाती हैयह समझना कोई मुश्किल नहीं है। दरअसल उसे लगता है कि नामदेव के साथ रहने पर उसके सपने पूरे हो सकते हैं उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति दोनों परस्पर विरोधी भावों से बनी है। अन्त में उसका क्या होता है पता नहीं लगता। हो सकता है कि उपन्यासकार ने उसे इसलिए रचा हो कि वह पाठकों के लिए पहेली बनी रहे या फिर आगे वही हुआ जो प्रायः जो इस प्रकार के मामलों में हुआ करता है।

रणविजय के बजाय रामदयाल का चरित्र अधिक परिपक्व  डायनामिक है। यद्यपि एक रात को लिली के साथ घटी धटना का विश्लेषण कर पाना काफी कठिन है। कहीं नहीं लगता कि दोनों का इस तरह का पारस्परिक कभी रहा  होहो सकता है यह आकस्मिक भावावेग मात्र रहा हो। चरित्र का यह आकस्मिक विचलन इस बात को लेकर भी हो सकता है कि हम एक दूसरे के साथ रहकर और घनिष्ठ संबध बनाकर भी आपस में सारी जानकारी नहीं रख पाते। मानव मन के बारे में किसी भी प्रकार की भविष्यवाणी प्रायः अनुमाननीय होती है। प्रसिद्व अंग्रजी 

उपन्यासकार ‘सौमट सेर मामएक जगह लिखते हैं... ‘मैं किसी पात्र को जैसा सोचकर रचता हूं केई बार उसका आचरण मेरी कल्पना के अनुरूप नहीं होता फिर इस घटना पर किसी और से कोई प्रतिक्रिया का  होना भी हैरानी पैदा करता है। क्या यह कोई ऐसी घटना थी जिसे सामान्य मानकर भुला दिया जा सकता था। दोनों में से कोई भी  इसके बारे में आत्मग्लानि महसूस करता है  आत्मिक संतृप्ति ही प्रकट करता है।

सरकारी जमीनदारी उन्मूलन कार्यक्रम को विभिन्न हथकंड़ों से क्रियान्वित  होने देने के प्रयासों का रामदयालरणविजय और रामप्यारे के साथ मिलकर विरोध करता है। वह स्वयं भी एक छोटामोटा जमीनदार हैं अपने आन्दोलन को प्रामाणिक बनाने के लिए पहले वह अपनी जमीन को अपने अधिकार क्षेत्र के किसानों में बांट देता है। यद्यपि इसके लिए उसे अपनी पत्नी और अन्य संबधियों का भारी विरोध सहन करना पड़ता है। जब भैया राजा सहित सारे जमीनदार एकजुट हो जमीनदारी उन्मूलन कार्यक्रम के राह में रोड़े अटका राहे होते हैं तब रामदयाल का यह कदम लोगों का मन जीतने वाला साबित होता है।

गॉधी जी किसी भी काम की शुरूआत अपने से करते थे इसी लिए जनता उनका साथ देती थी। यहां भी लोग रामदयाल का साथ इसी लिए देते हैं। रणविजय और रामप्यारे तो पहले ही सर्वहारा थे। उनके पास अपना कुछ भी नहीं था। इसलिए तीनों का नेतृत्व आमजन को बदलाव की राह दिखाने में उत्साहजनक साबित होता है।

भैया राजा का चरित्र शुरू में जैसा दिखाया जाता है अंत तक वैसा ही बना रहता है। वह पहले सारी रियासत पर अपना एकक्षत्र प्रभुत्व स्थापित करने की राह में कांटा बन सकने वाले अपने ही भाई रणविजय को दरकिनार करता है। फिर कांग्रेस में शामिल होकर रामदयाल और कांग्रेस के जिलाध्यक्ष को एक तरफ खड़ा कर देता और स्वयं विधानसभा का टिकट प्राप्त कर लेता है। तरह तरह की तिकड़मों से वह चुनाव जीत भी लेता है। अपनी ऐययाशी के लिए देवी स्वरूपा अपनी पत्नी के चरित्र पर आरोप लगाकर वह उसे महल से निकाल देता है और एक मेम को ले आता है। मेम के गर्भिणी हो जाने पर वह बच्चे को गिरवाना चाहता है जब मेम इसके लिए तैयार नहीं होती तो उसे राह से हटाने का षडयंत्र रचता है। पर मेम उसकी चंगुल से निकल कर रामदयाल के जमीनदारी विरोधी आन्दोलन में शरीक हो जाती है। आखिर भैया राजा की जमीनदारी के विरूद्ध संघर्ष इतना तेज हो जाता है कि उसे रोकने की सारी चालें असफल हो जाती हैं।

आश्चर्य है लिली का चरित्र जिस तरह उपन्यास में दिखाया गया है उसके माता पिता से किसी भी रूप में नहीं मिलता। उसकी मॉ जो एक भारतीय माता पिता की संतान है एक अंग्रेज से शादी करने के बावजूद अंत तक एक पतिपरायण आदर्श भारतीय नारी बनी रहती है। अंग्ग्रेज  पति उसके समर्पण और त्याग से अभिभूत दिखाई देता है। वह मन ही मन अंग्रेज औरतों से उसकी तुलना करता है और पाता है कि दोनों में कोई मुकाबिला नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश राज के जमाने में वह प्रशासनिक अधिकारी रहा था। गॉधी और उनके अनुयायियों से यहां की संस्कृति सेयहां के लोगों के छलकपट विहीन स्वभव से वह इतना प्रभावित हो जाता है कि इन्गलैन्ड जाने के बजाय वह यहीं रह जाने का फैसला कर लेता है। यहां के पुरातन साहित्य का अध्ययन करने और उसका अंग्रेजी में अनुवाद करने में वह स्वयं को झोंक देता है। दोनों रूस जाने के लिली के फैसले से आहत तो होते ही हैं लेकिन वह भी जानते हैं कि उनके किए कुछ होने जाने वाला नहीं है। परिणामस्वरूप वे लिली के इस कार्य को धीरे धीरे भुला देते हैं। और अपने अपने कामों में लग जाते हैं। रणविजय के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण बना रहता है।

पहली आज़ादी का आम लोगांे पर जादू एक डेढ़ दशाक तक चलता रहता है इसकी एक वजह तो यह है कि उनमें यह उम्म्ीद बनी रहती है कि उनके दिन बदलेंगे और वे सपने जो पहले दिखलाए गये थे पूरे होंगे। दूसरा कारण यह भी था कि उस समय में सरकार की बागडोर उन लोगों के हाथ में रही जो स्वतंत्रता सेनानी रहे थे और आम लोगों के हालात सुधारने की कम से कम आशायें बनाये रखने वाले थे। फिर उनके चरित्र भी बेदाग थे। वे अपने त्याग और देशभक्ति के कारण जनता के हृदय में इतना मोहक स्थान बनाये हुए थे कि चुनावों में बिना धन-बल और बाहु बल का प्रयोग किए जीत जाते थे या उनके विरूद्ध खड़ा होने की कोई हिम्मत ही नहीं दिखा पाता था। जो कुछ गड़बड़ियां या स्वार्थसिद्धियां हो रही थीं उन लोगों की ओर से हो रही थीं जो आज़ादी के पहले तक तो अंग्रेज सरकार के कृपापात्र थे लेकिन जैसे ही हवा पलटी कांग्रेस में  गये और जोड़तोड़ कर सत्ता के गलियारे में भी पहुंच गये। वे अन्यायभ्रष्टाचार और दमन पहले भी करते थे और बाद में भी जारी रखे रहे थे। इन परिस्थितयों ने लोगों का स्वप्न भंग किया। उन्हें लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। सत्ताहमेशा भ्रष्टअन्यायी  दमनकारी होती है। उस पर विश्वास करना मूर्खता है। इस लिए इसके विरूद्ध निरंतर आन्दोलन करते रहने की जरूरत है। सरकारें जनदबाव के सामने ही झुकती हैं। जरा सी भी ढील देना उन्हें निरंकुश बनने का अवसर देना है। लेकिन सवाल यह है कि आन्दोलन की निरंतरता कैसे बनी रहेदेश के कुछ लोग तो इतने संतोषी हैं कि उन्हें दिन में एक बार भी रोटी मिलती रहे तो उन्हें और कुछ नहीं चाहिए। कुछ लोग सक्रिय हो सकते हैं लेकिन उन्हें जीविकोपार्जन से ही फुर्सत नहीं मिलती। बाकी वे लोग हैं जिन्हें हर तरह की सुविधायें मिली हुई हैं। उन्हें किसी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं है। बल्कि उनकी तो हर मुमकिन कोशिश यही रहती है कि इसी तरह की यथास्थिति बनी रहे ताकि वे सुख भोगते रहें। 

पहली और दूसरी आज़ादी की लड़ाइयों के बावजूद देश की स्थितियों में वह परिवर्तन नहीं आया जिसके लिए वे लड़ी गईं थीं इन दोनों के बाद राममनोहर लोहिया व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई जिन्दगी भर लड़ते रहे पर व्व्यवस्था पहले जैसी ही बनी रही। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भी एक लड़ाई लड़ी गईं उसमें जीत हासिल कर लेने के बाद भी हालात वही बनी रही। अन्ना हजारे इसी तरह की एक लड़ाई छेड़े हुए हैं (वह भी सत्ता की माया में दब गयादेखना है कि उसका अंजाम क्या होता हैइमरजेन्सी के बाद से देश में जहां तहां अनेक छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहे हैं और अब भी हो रहे हैंये जनता को प्रभावित करने वचाले मुद्दों को लेकर हो रहे हैं। इनमें व्यवस्था परिवर्तन की जगह व्यवस्था में रहते हुए ही कुछ बदलाव लाने की कोशिशें हो रही हैं। भूमण्डलीकरण ने इस तरह पूंजीवाद के विरूद्ध पनपने वाले जनाक्रोश को टुकड़ों में बाट कर मुख्य लड़ाई का रूख बदल दिया है।

रामनाथ शिवेन्द्र एक जमीनी स्तर के सामाजिकराजनीतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने विभिन्न आन्दोलनों में भाग लिया है और अब भी संघर्षरत हैं। तीन उपन्यासों के बाद उनका यह चौथा उपन्यास है। कुछ कल्पनाकुछ यथार्थ और कुछ जमीनी अनुभवों का उपयोग करते हुए इसका कथानक बुना गया है। यह चाहे पूरी तरह इतिहास सम्मत  हो पर उस समय के लोगों की मनःस्थिति कोऔर अन्यायी व्यवस्था को बदलने की तड़प  को वाणी देने की कोशिश जरूर करता है।

प्रकाशितनया सबेरा.... 2010

समीक्ष्य कृतिदूसरी आज़ादी

पिलग्रिम्स प्रकाशनवाराणसी

 






  धरती कथा जमीन और संपत्ति के सवाल पर लिखा एक परिवर्तनकारी एवं लोक बोधी उपन्यास है आइए उपन्यास की भूमिका देखें-----

आखिर कब तक बंद रहेंगे हम

आधुनिकता तथा उत्तर आधुनिकता के बाजार के कार्टूनों में---

किसी आज्ञाकारी की तरह बोलने तथा न  बोलने के बारे में हमें बाजार से पूछ लेना चाहिए क्योंकि हम बाजार में हैं और वही हमारी जिंदगी यों का नियामक भी है लेकिन छोड़िए यह तो उपन्यास है उपन्यास नहीं बोलते इसे कौन नहीं जानता। उपन्यास तो वह सब भी नहीं कर सकते जिसे करने के लिए कुदरत खुली छूट देती है इस खुली छूट के बाद भी अगर उपन्यास कुछ कर सकते तो प्रेमचंद जी के सारे पात्र आज गली गली गांव गांव रोते चीचीयाते नहीं मिलते अपनी दरिद्रता से पूरित अस्मिता के साथ । इसीलिए आधुनिक तथा उत्तर आधुनिक उपन्यासों के केंद्र में वे अब नहीं है प्रेमचंद के उपन्यासों के नायक तो तबके हैं जब हम गुलाम थे आज हम गुलाम नहीं है। सो नायक चुनने का तरीक़ा भी हमारा बदल चुका है और अब हमारे नायक भी बाजार के उत्पाद जैसे हो गए हैं उन्हें कहीं भी देख सकते हैं किसी भी गली में किसी भी चौराहे पर ललकारते हुए की अरे भाई हमसे का मतलब। यह हमसे का मतलब कोई निरर्थक एक वाक्य या मुहावरा ही नहीं है यह तो बहुत ही गहरे अर्थबोध वाला है इसे खोलेंगे चाहे इसका अर्थ निकालेंगे तो इस एक वाक्य में आपको राजनीति समाज नीत अर्थनीति धर्मनीति सारा कुछ थोक में मिल जाएगा तो इसी का प्रतिनिधित्व करने वाले हमारे नायक हैं वे उपन्यासों से कविताओं से बाहर निकलकर सड़क पर खड़े हैं रोजगार दफ्तर के सामने खड़े हैं चुनाव लड़ने के लिए परचे खरीद रहे हैं ऐसे ही तमाम तरह के काम कर रहे हैं साथ ही साथ सत्ता के जनोपयोगी होने तथा ना होने के सवाल पर बहसें कर रहे हैं और उनके सामने ठीक उनके सामने वह जो लड़की अगवा की जा रही है वह जो आदमी बिना कसूर पीटा जा रहा है उसे केवल देख रहा है और मन के गहरे से बोल रहा है हमसे का मतलब।  वस्तुतः वह कुछ भी नहीं बोल रहा है और ना प्रतिरोध में कुछ कर रहा है वह हमसे का मतलब का मंत्र अपने मन में बिठाए तुलसीदास की चौपाई--- कोई हो नृप हमें का हानी का पाठ कर रहा है।

तो कहां जाना चाहिए कि आज हम पूरी तरह से किसी पाठ में तब्दील हो चुके हैं और हम से का मतलब का पाठ कर रहे हैं प्रस्तुत उपन्यास धरती कथा के पात्रों किसी पाठ में है की तब्दील हो चुके हैं किसी पात्र में ही नहीं इसकी घटनाएं भी पाठ की तरह ही उपन्यास में उपस्थित है पर यह जो समय है वह सभी से संवाद करते हुए फटकार रहा है अगर तुम घटना के साक्षी तो देखो और समझने की कोशिश करो की घटनाएं कैसे घटा करते हैं कैसे अपनाना नायकत्व सिरज लिया करती हैं। घटना के पात्र घटना का मुख्य किरदार होते हुए वी घटना के घटित से बाहर कहीं दूर कहीं दूर बहुत दूर कूड़े की तरह फेकाये हुए हैं। उनका नायकत्व उनसे छीन लिया गया है तो यह है नायकत्व का घटना में विलोपन। और उसका घटना के घटित होने द्वारा अधिग्रहण। तो आज के समय में यह जो घटित है वह घटना तो है ही घटना का नायक भी है ऐसे में अब नायकों की क्या जरूरत जरा गुनिये इस बाबत।

जरूरत तो नहीं है मैंने पूरा प्रयास किया इस उपन्यास में विशेष किस्म का कोई करिश्माई नायक चुनूं पर ऐसा ना कर पाया घटनाएं जो खून आलूदा थी वह मुझे लगातार घसीटते रहीं कभी मुझे भाई की तरफ ले जाती तो कभी दाईं एज लं तरफ तो कभी आज के सत्ता बाजार और उसके कोतुको की तरफ। आप तो जानते ही हैं कि सत्यता कौतुक में जो फंस गया वह भी और जो रम गया वह भी से बाहर नहीं निकल सकता। धरती कथा का एक पात्र नायक की तमीज तमीज वाला सरवन था  वह करिश्मा जरूर करता है पर उसकी हत्या कर दी गई उसकी कथा के साथ दूसरे 9 जवानों की बर्बर हत्या ने उपन्यास के कथानक को पूरी तरह से बदल दिया जिसके लिए मैं सचेत नहीं था सो सरवन के साथ पूरा होने वाला जो कथानक था वह बर्बर हत्या की घटना में खो कर रह गया। सरवन के बाद थोड़ी सी आस जगी थी कि बबुआ कथानक में कुछ विशेष करेगा जो नए किस्म का होगा पर वह बेचारा तो बर्बर हत्या की जांच पड़ताल की मायाजाल में उलझ कर रह गया । वह साहस कर के पुलिसिया कार्रवाई के जाले को फलाने तथा अदालती  संस्कारों से निजात पाने से एक कदम भी आगे बढ़कर कथानक को कुलीन ना बना पाया हो कथानक  कैसे अद्भुत बन पाता जैसा कि अद्भुत होना उपन्यास के लिए जरूरी हुआ करता है।

तो ऐसा ही है इस उपन्यास में आपको घटना के साथी अपनी संपूर्ण बौद्धिकता के साथ आलोचनात्मक होते हुए दो चार कदम आगे चलना होगा और आगे चलते चलते वह गांव भी आपक

मिलेगा दो उपन्यास का केवल कथा ना कि नहीं उसका नायक भी है तो वहां पहुंचकर मुझे बताइएगा जरूर कि वह गांव आपको कैसा लगा आपके उत्तर की प्रतीक्षा में।

राम नाथ शिवेंद्र 

मनीष पब्लिकेशन्स

४७/१०,एक ब्लाक,पार्ट-द्वीतिय

सोनिया बिहार,दिल्ली-११००९४

०९९६८७६२९५३

















  

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